Saturday, July 8, 2017

आखिर कौन है ये शिर्डी के 'साईबाबा'

*आखिर कौन है ये शिर्डी के 'साईबाबा' , अक्कलकोट के 'स्वामी समर्थ' और शेगाव के 'गजानन महाराज' ?*

ता. 19 जुलै 1994 को संपादक दिपक तिलक ईनका सह्याद्री अंक मे "दुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है" यह लेख प्रसिद्ध हूआ था। लेखक अरुण ताम्हणकर ईनोने रहस्योद्घाटन करते हूए एक अज्ञात साधु का आधार लिया है । ऊनका ये लेख दै. मुलनिवासी नायक के पास ऊपलब्ध है । ताम्हणकर ईस लेख मेँ जो कहते है ऊसका सारांष तो यही कहता है सदाशिवराव पेशवा ही स्वामी समर्थ है। तात्या टोपे ये शेगांव का गजानन महाराज है। दुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है। लेखक ताम्हनकर को बाबा के प्रकटिकरण मान्य नही, वे कहते है कि, ये बाबा लोग अचानक प्रकट कैसे हूए? साधारण आदमी के तरह माँ के पेट से जनम क्यो नही लिया? स्वजाति के बारेमे अपनने ऊलटा सिधा बोल दिया, ईसके लिए ताम्हणकर ने अपना मुँह बंद किया तो कभी खोला ही नही। ब्रामणो ने स्वामी समर्थ महाराज ईनके कई जगह मठ स्थापण किये। अक्कलकोट, मंगलवेढा, चिपलुण, अहमदनगर, कल्याण, दादर, गिरगांव (महाराष्ट्र) ईन प्रमुख संस्थानो (मठ) मे स्वामी का प्रकट दिन हर साल मनाया जाता है । और हर मठो मे खालि सिंहासन है । क्यो कि सिर्फ ब्रामण ही जानते है की स्वामी समर्थ ये पेशवा सदाशिवरावही है । ईस प्रकरण का शोध लेने के लिए प्रत्यक्ष कुछ मठो मेँ भी जाकर देखा है। यह लेख किसीकी भावनाओ को ठेच पहूचाने के लिए नही लिखा गया है । सामान्य जनता को ब्रामणी षडयंत्र समझे, गुप्त बाते समजकर अंधश्रद्धा का खात्मा हो यही हेतु है। पानिपत कि तीसरी लडाई ता. 13 फरवरी 1760 को पटदुर यहा विश्वासराव पेशवा ईनके साथ सदाशिवराव पेशवा को मिशन पर भेजने का निर्णय लिया गया। ग्वालियर होकर ता 30 मई 1760 को तोफ, रसद, बारुद, घोडदल, कुछ औरते लेकर सव्वालाख फौज निकली। अहमदशाह अब्दाली चौकन्ना हो गया, वह कुशल सेनापती था ऊपर से पेशवाओ मे चालाकी का अभाव था। सदाशिवराव ये कुत्सित जिद्दि स्वभाव के थे (ऐसा ब्रामण कादंबरीकारो ने लिख कर रखा है) ता. 14 जनवरी 1760 को पानिपत यहा लडाई हूई। विश्वाराव ईनकि गोलि लगने से म्रुत्यु हो जाति है तो सदाशिवराव बच्चो कि तरह रोने लगते है ईससे सैनिको का मनोबल कम होता है । सदाशिवराव को बिना लडखडाए मैदान खडा रहना आवश्यक था। पर अचानक सदाशिवराव मैदान मे से गायब हो गये (म .यु. भा. ईतिहास पेज क्र 112)। ईतिहास मे पाणिपत कि लडाई का वर्णन सव्वा लाख चुडिया तुट गई ऐसा किया गया है । स्वामी समर्थ अचानक ऊसी समय 1760/61 मंगलवेढा (महाराष्ट्र) को प्रकट हूए स्वामी समर्थ के प्रकटिकरण से पाणिपत कि लडाई का घटनाक्रम जुडता है ।पहले तो मंगलवेढा गांव के लोग ऊन्हे नग्न, मतिमंद, पागल व्यक्ती समजते थे। कुछ सालो में ही ईस तरुण नग्न मनुष्य का दिगंबर बाबा हो गया। (गांधिजी भि सव्वालाख पट चालाक थे ऊनोने प्राप्त किया हूआ महात्मापन एकनंबर माडल है।) स्वामि समर्थ का चरित्र ई. स. 1818 को ब्रामण गोपलबुवा केलकर ने स्वामी कि पहलि बखर(Historical document) लिखि । गोपालबुवा ये स्वामी के बहुतसी गुप्त बाते जानने वाले शिष्य थे । ऊसके बाद ता. 09 मई 1975 को रामचंद्र चिंतामण ने बखर का पुन:लेखन किया । अनंतकोटी ब्रम्हांडनायक राजाधिराज स्वामी समर्थ महाराज ईनका जनम कहा हुआ? वो छोटे के बडे कहा हुए ? ऊनके मातापिता कौन ? ऊनकी जाति कोनसी ? ईनमसे कोई भि बातो का पता नही चलता ऐसा बखर मे लिखा है । स्वामि मंगलवेढा मे 12 साल रहे । गांव के लोग ऊनको मतिमंद मनुष्य समजते थे ।बसप्पा तेलि के घर मे रहने वाला यह नग्न व्यक्ती सिंदुर लगाए हूए पत्थरो पर पेशाब करता था ।स्मशान मे कबरो पर संडास करता था ।बसप्पा तेलि के घर के चुल्हे मे संडास करता, ये सब स्वामी की लिला थी, वे अवतारी पुरुष थे ऐसा बखर कहती है (अंग्रेजो को कुछ ब्रामण साधु सन्यासीयो के जिवन चरीत्र के सबुत मिले एक जानकारी हमारे पढने मे आयी के एक साधु अपने अनुयाईयो को अपनी संडास खाने देता और ऊसके बाद ही ऊसे अपना चेला बनाता )। परंतु बसप्पा कि पत्नी मात्र अपना पती कहासे ईस मतिमंद पगले के पिछे लग गया ईसके लिए दुखी थी । रोजि रोटी करके पेठ भरनेवाला यह तेलि परिवार बहुत ही गरीब मे जी रहा था ।अचानक बसप्पा के परिवार को कहासे तो सोने की खान मील गयी और उनकी गरीबी हमेशा के लिए नष्ट हो गयी । असलियत मे स्वामी को मिलने के लिए मालोजिराव पेशवा मंगलवेढा आते थे ।ऊन्होने स्वामी का महिने का खर्चा बसप्पा को देने की व्यवस्थ लगा रखी थी । स्वामी कभी कभी बसप्पा के परिवारवालो को घर से बाहर निकाल देते और दरवाजे के सामने लाठी लेकर बैठते ।पेशवाओसे महिना अर्थसहाय्य मिलने के बाद गणपत चोलप्पा नाम का नौकर स्वामी की सेवा के लिए ऊपस्थित हो गया ।मै टोली तयार करता हू, स्वामी मंगलवेढा मे रहते समय ऊन्हे जबभी पागलपन का झटका आता तो ऊने शांत करने के लिए चेले गांव कि मतिमंद स्त्रि सरस्वती सुनारीन को लाते ।यह मतिमंद स्त्रि लाठी और बगल मेँ फटे कपडो का गठ्ठा लेकर चेलो के पिछे भागती एक चेला कहता 'ज्ञानबा तुकाराम' अर्थात दुसरा कहता 'पगली का क्या काम' यह शरारत देख स्वामी जोरजोरसे हसते इतना कि ऊनका पलंग भि हिलता ।12 साल रहने के बाद भी स्थीती नही सुधारी ।अक्कलकोट मे चिंतोपंत टोल के यहासे एरंडी की सुखी लकडियो के हथेलिभर तुकडे करते । ऊनमे मिट्टि भरते और फिर पाँच पाँच सात सात तुकडे सैनिक बंदुक जैसे रखते है उसि प्रकार लाईन से रखते । ये ऊपक्रम कई महीने चलता किसिने अगर पुछा तो स्वामी कहते मै टोली (पलटन) तयार करता हू ।ऊसके बाद स्वामी अक्कलकोट मे दुसरा खेल खेलने लगे । अक्कलकोट मे लक्ष्मी नाम कि ऐक तोफ है वहा जाकर तोफ के मुंह मे सिर डाल कर घंटो बैठते ।बुधावारपेठ मे बडबडाते 'अब हिंदु का कुछ रहा नही घोडा गया हाति गया पालखि गया सब कुछ गया' और बिचमेही चिल्लाते सरबत्ती लगाव! यह सब पाणिपत की हार का परिणाम तो नही ? आज तक सदाशिवपेठी लेखक पेशवाओ के गुण गाते नही थके । स्वामी, राऊ ईन कादंबरीयो मे 'तोतया' कहके ईसि पागलपण का वर्णन किया है ।जो पेशवा गिरफ्तार हुवा क्या वो पागल था ? क्या वो पागलपण का नाटक करता था ? ऐसा प्रश्न कादंबरी पढने वालो को नही पडा ।                     स्वामी एक जगह कभी बैठते नही थे । दिन मे सात आठ बार वो जगह बदलते ईसिलीए ऊन्हे चंचल भारती भी कहते । अक्कलकोट मे स्वामी के स्वतंत्र आश्रम की व्यवस्था की गयी थी । ईस काम मे राणी साहब बहूत ज्यादा ध्यान देती । ईस प्रकार ब्रामणी खोपडी ने मतिमंद सदाशिवराव का स्वामी समर्थ महाराज किया था ।स्वामी के दर्शन से हमारे तूम्हारे प्रश्न छुटते है , भाकड गाय दुध देती है , स्त्रियो को बच्चे होते है । ऐसा प्रचार अडोस पडोस के गांवो मे किया जाता प्रचार मे ब्रामण स्त्रियो का भी सहभाग रहता । पेशवाओ के दफ्तर के दस्तावेजो के प्रमाण से पता चलता है की ब्रम्हेंद्रस्वामी धावडशिकर ये स्वामी के भेस मे शाहूकार और बद्चलन आचरण के थे । ब्रंम्हेँद्रस्वामी के पास लगभग 20 स्त्रि दासिया थी । जहा जहा स्वामी रहते वहा वहा स्त्रि दासिया जाती । ऊनमेँसे कुछ प्रसिद्ध दासियो के नाम ईस प्रकार से है सजनी, गंगी, सोनी, लक्ष्मी, मानकी, नागी, राधी, गोदी, नथी, कृष्णी, यशोदा, नयनी, आनंदी, ई . ये सभी पेशवाओ कि तरफ से नजराणा था ऐसा जानकारो का कहना है । ईतनाही नही जिनको पुत्रप्राप्ती नही होती थी ऊनको स्वामी के पास लाया जाता और ऊनको स्वामी का विशिष्ट प्रसाद दिया जाता । कुछ रातो को तो स्वामी के मठो से अनैतिक मार्ग से पुत्रप्राप्ती की जाती । ईस सारे खेल पर पेशवाओ के जबरदस्ती कि वजह से परदा पड जाता । यही रित स्वामी समर्थ कि थी ऐसा दस्तावेजो के आधार पर प्रमाणीत किया जा सकता है।                                                     "मुंगी पैठण की विठाबाई"                  स्वामी के दर्शन को भक्त आने लगे। आश्रम मे गाय, बकरी, कुत्ते, बिल्लियो की संख्या बढने लगी । केशर कस्तुरी के मिश्रण करके पेशवाओ की तरह सीर पर गंध लगाया जाता स्वामी कभी दाढी रखते कभी निकालते वे लहरी स्वभाव के थे ।स्त्रीयोँ के सत्र मेँ पुरुषो को प्रवेश नही था । स्वामी को कभी कभी साडी चोली पहनाकर बिठाया जाता पर स्वामी अधिकतर लंगोठ पहनकर बैठना पसंद करते ।मुंगी पैठणकी विठाबाई ये भि स्वामी की दासी थी । एकबार ऊसने चोलप्पा गणपत को साथ मेँ लेकर पंढरपुर जाने का विचार किया ।स्वामी को ये समजने के बाद स्वामी ने सबके सामने उसको पुछा की क्या ? अब तक विठोबा का लिंग पकडने नही गयी ? यह सुनकर वहा ईकठ्ठा हूई सभी औरतो ने शर्म से गर्दन निचे कर दी (स्वामी समर्थ बखर पेज क्र. 46)।                                                        " सुंदराबाई प्रकरण "                  दिन ब दीन अक्कलकोट मे भक्तो कि संख्या बढती गयी वैसे संस्थान मे पैसो की आमदनी भी बडी । उसी दौरान सुंदराबाई नाम की तरुण विधवा स्वामी की दासी बन गयी ।वो गणपत चोलप्पा बालप्पा ईनको आदेश देने लगी । तो स्वामी ऊसको कहते " ऐ रांड नौकरणी ये क्या तेरे घर के नौकर है ? "। स्वामी को खाना खिलाना, नहाना, दर्शन के लिए तयार करना ये सभी काम वो करती ।ऊसने स्वामी को ऊठने को कहा तो वो उठते, सोने को कहा तो सोते ।ईतनाही नही भक्त दर्शन के वक्त सुंदरा स्वामी को पत्नी कि तरह चिपककर बेठने लगी ।संस्थान का अनगिनत पैसा सुंदराबाई हडप करने लगी ।तक्रार करने पर शिष्यो ने ऊसे जेल मे डाल दिया । स्वामी अवतार थे पर स्त्रिलंपट थे आखिर मामला पोलीस तक पहूचना जरुरी था, स्वामी समर्थ के अवतारवाद पर प्रश्नचिन्ह खुद स्वामी ने ही लगाया। ये अवतार न होकर पाखंड था ये सिद्ध हो चुका है ।                   स्वामी की बखर मे 264 प्रकरण है, वो सब को येहाँ सभी देणा संभव नही है । एक बार कर्वे नाम का ब्राम्हण स्वामी को मिलने आया, कर्वे ईनकी जवान लडकी बिगड़ गयी थी । स्वामी ने कहा " होली किजिए " कर्वे को बडा ही धक्का पहूचा तो ऊनोने पुछा आपकी जाती कोनसी ? तो स्वामी ने जवाब दिया " यजुर्वेदी - ब्रामण, गोत्र- कश्यप, रास - मिन " (स्वामी समर्थ बखर पेज क्र 58 ) । ई स 1800 को स्वामी की मृत्यु हो गयी स्वामी तब वे सत्तर साल के थे । ई स 1800 मे चैत्र शुद्ध पुर्णीमा को ऊनका मृत्यु हूआ स्वामी की प्रेतयात्रा को हाथी से सजाये हुए, घोडे की तोफदार जरिपटका के पेशवे का निषाण बारुदकाम करने वाले ऐसा माहौल था । स्वामी पर भरजरी पोशाख व अलंकार चढाए गये । स्वामि को आखिर मेँ सुगंधी पेटी मे बंद किया गया ऐसा बखर मे लिखा है। परंतु 14 जनवरी 1761 को मैदान से भागे हुए सदाशिवराव का अंत हुआ था ।स्वामी मंगलवेढा मे रहते समय पेशवाऔ की तरफ से उनको मिलने वाला खर्चा कभी बंद नही किया गया। स्वामी ने एक बार मालोजिराव के गाल पर थप्पड लगाई ऊसका कारण यही था कि सदाशिवराव ही स्वामी समर्थ थे । आगे यही प्रयोग तात्या टोपे और नानासाहब पेशवा के साथ किया गया । क्योकी ब्रामण मतिमंद पागल आदमी को स्वामी समर्थ बना सकते है तो सिर से पैरो तक ठिक ठाक दिखने वाले तात्या टोपे को गजानन महाराज और नानासाहब पेशवा को शिर्डी के साईबाबा क्यो नही बना सकते ?                                                " तात्या टोपे ही है गजानन महाराज "                 1818 को भिमा कोरेगाव पेशवाओ की हार हुई ।भारत मे अंग्रेजो कि सत्ता प्रस्थापित हूई । अंग्रेजो के विरुध कयी लड़ाईया हुई उनमेसे 1857 की लड़ाई एक संगठित प्रयास था । परंतु तात्या टोपे, नानासहब पेशवा, लक्ष्मीबाई ईनके नेतृत्व मे किया गया यह प्रयास असफल साबित हुआ ।हारने के बाद ये लोग भूमिगत हो गए । नानासाहब पेशवा, तात्या टोपे, रंगो बापुजी ये लोग साधु पंडीतो का भेस धारण कर भटक रहे थे ('रंगो बापुजी' लेखक-प्रबोधनकार ठाकरे-(शिवसेना के बाल ठाकरे के पिता), पान क्र 270) कई लोगो को फासी दि गयी पर परंतु ऊनके रिश्तेदारो ऊनकी लाश पहचान से ईनकार कर दिया । करीब एक साल पहले कि बात है दैनिक जागरण मे एक व्रुत्त प्रकाशीत हूआ है , तात्या टोपे को फासी दि गई पर वो कोई दुसरा ही था , ऐसी खबर है । लेखक ताम्हणकर का कहना है की तात्या टोपे का वर्णन शेगांव के गजानन महाराज से मिलता जुलता है ,शेगांव मे प्रकट होने वाले गजान महाराज तात्या टोपे ही है ऐसा उनका स्पष्ट कहना है। साईबाबा और गजानन महाराज एकही वक्त मे होके गए । दोनो को चरित् मे दोनो की कभी मुलाकात होने की खबर नही मिलती ।परंतु जब गजानन महाराज का मृत्यु हुआ तो इधर साईबाबा ' मेरा गया रे ' कहकर दुःख व्यक्त कर रहे थे । असल मे ये लोग संत महापुरुष थे ही नही ब्रामणो ने बनाए हुए बेहरुपीये थे । सुख दुःख के भी आगे निकल चुके संतो से तो ये अपेक्षीत नही की वे अपना सेनापति मरने का दुःख जाहिर करे पर इसका दुःख नानासाहब को हुआ । ' सांईबाबा मतलब दुसरा नानासाहब पेशवा ' ! साई यह नाम इसा से लिया गया है । केसरी प्रकाशन ने प्रकाशित किया गया ' पेशवा घराणो का ईतिहास ' ईस किताब मे लेखक प्र ग ओक कहते है दुसरे बाजिराव ने 7 जुन 1827 को गोविंद माधवराव भट ईस लडके को गोद लिया । उसकी जनतारिख 6 दिसंबर 1824 ऐसी है । मतलब 1857 के युद्ध मे दुसरे नानासाह पेशवा 32 साल के थे ।                नानासाहब पेशवा को संस्कृत , पर्शियन(ईराणी) , ऊर्दू ईन भाषाओ का ज्ञान था । नानासाहब पेशवा हमेशा किनरवापी कुर्ता डालते । शिर्डी के साईबाबा का द्वारकामाई चावडी के पास का फोटो सबके परिचय की है । 28 फरवरी 1856 को अंग्रेजो ने नानासाहब पेशवा को पकडने के लिए इनाम जाहिर किया था । रंग गेहुआ , बडी आंखे , छह फिट दो इंच लंबाई, सिधा नाक, साथ मे तुटे कान का नोकर ऐसा भेस जाहिर किया गया था । नानासाहब समझ कर दूसरे किसीको ही फासी दी गई थी । असल मे नानासाहब कबके फरार हो चुके थे । साई यह गांव मै जहा पे पढता हू ऊधर रायगड जिले (महाराष्ट्र) के चिरनेर के पास है । परंतु साई यह नाम ब्रामणो ने येशु ख्रिस्त के ईसा का उलटा लिया है । ब्रामण मतिमंद पागल सदाशिवराव को स्वामी बना सकते है तो नानासाहब पेशवा को शिर्डी का साईबाबा भि बना सकते है ।ईन स्वामी बाबा महाराजाओ को लोगो को गाली देने कि आदत थी । और स्वामी समर्थ और साईबाबा ईनकी काठी एक जैसी ही है । और काठि पर हात रखने का तरीका भी एक जैसा है यह विशेष। ओर दुसरी विशेषता तो यह है की इनको कई तरह की गंदी आदते भी थी उनमे से एक गजानन महाराज की गांजा पिते हूए एक तसविर बहुत लोकप्रिय है । अय्याशीयो से ही गांजा पीने की आदत लगती।               मुलनिवासी बहूजनो के संत मोह, माया, संपत्ती से दुर रहकर लोगो को जिने का मार्ग दिखाते । ' व्रत काया कल्पो से पुत्र होती, तो क्यो करने लागे पती ' । यह भावना विज्ञानवादी विचारधारा का ऊदाहरण है । चिलिमधारी गांजाधारी फोटो का मानसशास्त्रिय परिणाम छोटे बच्चो तथा समाज पर क्या होता होगा ? वर्तमान मे जो काला पैसा कमाते है , भाईगिरी , चोरी खुन करके पैसा कमाते है , बडे बडे गुंडो के आश्रय से राजनिती मे आते है । 'चरीत्रहीन काम करके मै ही चरीत्रवान ' ईसलिए दर्शन के लिए बिना किसी लाईन मे लगके दर्शन के लिए ज्यादा का पैसा देकर शार्टकट दर्शन लेते है । अमिताभ बच्चन का दर्शन घोटाला तो बडा ही फेमस है । बाल ठाकरे ने भि साईबाबा को क्या क्या नही दिया था यह प्रकरण भि बडा ही फेमस हूआ था । काँग्रेस, राष्ट्रवादी , बिजेपी के नेताओ ने पुंजिपतियो ने कितना पैसा ईन मंदिरो को दिया ईसका कोई हिसाब है ? । यह राजस्व प्राप्त करने का नया तरीका है क्या ? भारत को आजादी मिलने के बाद संस्थानिको के संस्थान विलीन किए गए बदले मे उनको तनख्वा देने कि व्यवस्था कि गई कुछ दिनो बाद भारत सरकार ने तनख्वा बंद किया । ऊसके बाद संस्थाने राजापद इतिहासगत हो गई । परंतु आजादी के बाद अस्तित्व बनाए रखने वाली ब्रामणी व्यवस्था की संस्थाने गब्बर होती जा रही है । इन संस्थानो के आश्रय से अंदर बैठने वाले बुवा , बापु , बाप्या , स्वामी, दादा, नाना-महाराज, सद्गुरू इनकी कृपा से हमारे तुम्हारे प्रश्न चुटकी बजाते ही छुट जाएंगे ऐसा प्रचार यह ब्रामण और ऊनके दलाल हमेशा करते रहते है । धर्म , भक्ती, सेवा, श्रद्धा, अध्यात्म, ब्रामणी कर्मकांड ईनको आकर्षित होकर खुद ही ब्रामणी संस्थानो मे प्रवेश करते हैँ । नसिब पर विश्वास रखकर जिने लगते है । दैववादी बन जाते है । ब्रामणी कर्मकांडो के जाल मे फस चुके लोगो का कर्मवाद पर से विश्र्वास कम होते जाता है ओर वो ब्रामणो का मानसिक गुलाम बन जाता है। ईनमे अशिक्षित शिक्षितो के साथ अमिर गरीब सभि का जमाव रहता है । विशेषता तो यह है की मानसिक विकलांग लोग खुद को ब्रामणी व्यवस्था के गुलाम कभी नही समझते । ईसकी कल्पना तक नही करते ।                  गुलामी की बेडीया तोडने का काम तो दुर ही ।ईन संस्थानो मे श्रद्धा के नाम पर लोगो से पैसा निकालने की योजनाए बनाई जाती है ।काकड आरती, महाआरती ,पालखी , ऊत्सव ,अभिषेक ,दर्शन ऊत्सव ,बेडिया, व्रत, मृतआत्माओ को खुश करना, चुटकी बजाते अमिर होना ,गुप्तधन, दिर्घायुष्य माला ,होम हवन ईन सब के द्वारा वो आपके जेब मे हात डालते हैं। इसतरह करोड़ो रुपयो का निधि रोज के रोज संस्थानो की दानपेटीयो मे झरने समान गिरते रहेगा ऐसी ब्रामणी षडयंत्रकारी योजना है । भारत के वित्तिय बजट से दस गुणा ज्यादा रकम मंदिरो मे हर साल जमा होती है, वो कहा जाती है? जहा पे भुखमरी से लोग मर जाते है, किसान आत्महत्या करते है , वही पे होम हवन करके लाखो रुपयो का दूध , दही , घी ,अनाज जलाया जाता है ।यही इस देश की दुविधा है । जिन पेशवा ब्रामणो ने छत्रपति शिवाजी महाराज को जहर देकर मारा वही ब्रामण पेशवा अर्थात साईबाबा, गजानन महाराज, स्वामी समर्थ हमारे प्रेरणास्त्रोत कैसे हो सकते है ? जिन पेशवा ब्रामणो ने अछुतो के गले मे मटकी बाँधकर उनका थुकना तक पाप होता है ऐसा माना, उनके पैरो के निशान भी जमीन पर नही दिखने चाहिए इसके लिए उनके कमर को झाडु लगाया, ऐसे लोगो को हम अपना प्रेरणास्त्रोत कैसे मान सकते है ? फुले , शाहू , आंबेडकर ईनोने जो 108 साल जो क्रांतीकारी संघर्ष किया , जिससे गले की मटकी दूर होके उसके जगह टाई आ गई । शरीर पर कोट, सुट अच्छे कपड़े आ गए । पैरो मे जूते आ गए । जिन ब्रामणो ने ओबिसी को शुद्र कहा आज लोकतंत्र मे वही ब्रामण राजा बने हुए है ।                 मुलनिवासी बहूजनो ने अपने महापुरूषो को प्रेरणास्थान मानना चाहीए । अपने बाप को ही बाप मानना चाहीए ।                  पेशवा ये विदेशी युरेशियन ब्रामण है । वे अंग्रेजो से झगडते वक्त हार गए और भाग गए अंग्रेज पकड़ेंगे इस डर से ईन लोगो ने दूसरा मार्ग अपनाया वो मतलब साधु, स्वामी बनना । शिर्डी के साईबाबा - दुसरा नानासाहब पेशवा , स्वामी समर्थ -सदाशिवराव पेशवा , गजानन महाराज - तात्या टोपे ये सभी पेशवा ब्रामण है यह इतिहास से सिद्ध हो चुका है । इन संस्थानो के मेडिकल, इंजिनिअरींग काँलेजेस है । यहा पे ब्रामणो के बच्चे पढते है और बाद पास होने के बाद इन विध्यार्थीयो से दो साल के लिए पुर्णकालिन कार्यकर्ता बनाकर काम करवाया जाता है ।आगे यही विध्यार्थी ब्रामणी व्यवस्था के कट्टर समर्थक कार्यकर्ता बनकर ब्रामणी व्यवस्था का मेंटेनन्स करने का काम करते है ।

Monday, March 20, 2017

महाड़ में पानी का संघर्ष शुरू करके ब्राम्हणवाद को ही आग लगा दी।

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जी ने आज ही के दिन महाड़ में पानी का संघर्ष शुरू करके ब्राम्हणवाद को ही आग लगा दी।
 

महाड़ में ही ब्राम्हणो ने डॉ बाबासाहेब आंबेडकर और उनके अनुयायियों के ऊपर पत्थर फेंके थे।
महाड़ के मामले की केस 1927 से 1936 तक चली।बिच में ही काला राम मंदिर का संघर्ष हुआ । येवला में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने आंदोलन की व्याख्या करते हुए कहा था कि हमें मानवीय अधिकार चाहिए। ब्राम्हणो के मंदिरों में हमें जाने की जरुरी नहीं है।
येवला में धर्मान्तर की घोषणा की थी।और 21 साल बाद ब्राम्हणी धर्म को लात मारी थी।
आज ही के दिन देवेन्द्र फड़णवीस ने मुम्बई में 6 दिसम्बर 2018 को क्या क्या षड्यंत्र करना है इसकी मीटिंग की। आरएसएस के ब्राम्हण जानते है कि डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की हत्या की है इसका अपराधबोध होता है।उन्हें यह भी पता है कि डॉ बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा एवं बहुजन मुक्ति पार्टी के कारण डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जी के हत्यारे एक्सपोज हो गए है। इस बात का भी उन्हें डर सताने लगा है।साथ ही भारत मुक्ति मोर्चा ने पूरे देश भर में 1 जनवरी 2018 के यादगार साल के उपलक्ष्य में यानि पेशवा ब्राम्हणो के राज के खात्मे को 200 साल पूरे होनेवाले है। इस डबल सेंच्युरी को मूलनिवासी बहुजन समाज वर्तमान पेशवाई को खत्म करने के लिए बहुजन क्रांति मोर्चा के माध्यम से तैयारी में है ।इस बात का भी डर विदेशी ब्राम्हण फड़णवीस, भागवत को डर सताने लगा है ।
चलो इस साप देवेन्द्र फड़णवीस को पैरों तले कुचलने का समय आ गया है।
बोलो 85 जय मूलनिवासी।

हमेशा याद रखें '20 मार्च 1920' को.

हमेशा याद रखें कि आज ही के दिन, '20 मार्च 1920' को, 'माणगांव परिषद' हुई थी जिसमे दोनों महांपुरष 'छत्रपति शाहू जी महाराज' तथा 'डॉ भीम राव आम्बेडकर' इकट्ठे थे //

'माणगांव परिषद के कुछ 'अँश' .→ प्रचंड नाग …… सुनो ! ‘केलवकर’, हुआ यूँ कि, “ ‘मैं’ एक बार ‘सतारा’ गया था । हमारे लिए ही भोजन का कार्यक्रम चल रहा था । भोजन ‘ब्राह्मणी’ पद्धति का था । ब्राह्मण ‘रसोइये’ भोजन तैयार कर रहे थे । खाने का समय हो चला था । ‘स्नान’ कर ‘मैं’ यह देखने के लिए ‘घूमने’ लगा कि, भोजन की तैयारी कहाँ तक पहुंची है । बहुत सारे हंडे थे । उनके बीच ‘अंतर’ भी बहुत था । एक ‘नंग-धड़ंग’ ‘ब्राह्मण’ रसोईया हाथ में ‘बिल्ली’ लेकर इधर-उधर घूम रहा था । उसने मुझे देखा व बोला, “यहाँ ‘घूमने’ नहीं दिया जाएगा, आपके ‘छूने’ से सारा ‘गड़बड़ –घोटाला’ हो जाएगा /” इन ‘शब्दों’ के कान में पड़ते ही मेरा ‘कलेजा’, मुंह को आ लगा । उस ‘बिल्ली’ की ‘अपेक्षा’ मेरा ‘दर्जा’ निम्न है ? मैं ‘स्वयं’ से यह ‘प्रश्न’ पुछने लगा । ‘छत्रपति’ होते हुये भी, जहां मेरा ऐसा ‘अपमान’ होता हो, वहाँ ‘अस्पृष्यों’ का कितना ‘अपमान’ होता होगा ? इसी लिए मुझे लगता है कि, ‘महार’ बच्चों को, पास लेकर ‘खाना’ खाऊँ ।“
ऐसे ‘महान’, ‘संवेदनशील’ व ‘मानवतावादी’ राजा का वर्णन करते समय, ‘शब्द’ कम पड़ जाते हैं । इन ‘यूरेशियन ब्राह्मणो’ को ‘राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज’ का , ‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ के ‘वंशज’ का, कोल्हापुर’ रियासत के ‘मालिक’ का, ‘मराठों’ के ‘प्रतिनिधि’ का स्पर्श ‘अपवित्र’ लगता था लेकिन, ‘बिल्ली’ जैसे प्राणी का ‘स्पर्श’, अपवित्र नहीं लगता था । इसका मतलब वह ‘यूरेशियन ब्राह्मण’, ‘राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज’ की अपेक्षा ‘बिल्ली’ को ‘पवित्र’ मानता था तथा ‘महाराज’ को, ‘अपवित्र’ मानता था । धन्य हैं वे ‘यूरेशियन ब्राह्मण’ और ‘धन्य’ है उनकी ‘वर्ण-व्यवस्था’ व ‘अस्पृश्यता’ । और ‘धन्य’ है आज के ‘यूरेशियन ब्राह्मण’ जो उपरोक्त सभी बातों का ‘समर्थन’ करते हैं ।
 

 ‘माणगाँव’ परिषद के बाद, ‘नागपुर’ में अखिल भारतीय ‘बहिष्कृत समाज’ की ‘परिषद’ 30 मई 1920 को, पुनः दोनों ‘महापुरुष’ इकट्ठा हुये । परिषद के अध्यक्ष, ‘राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज’ थे । अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होने कहा – “ किसी को ‘अस्पृश्य’ कहना ‘निंदनीय’ है । आप ‘अस्पृश्य’ नहीं हैं । आपको ‘अस्पृश्य’ मानने वाले सभी ‘लोगों’ की ‘अपेक्षा’ आप अधिक ‘बुद्धिमान’, अधिक ‘पराक्रमी’, अधिक ‘सुविचारी’ व अधिक ‘त्यागी ‘ हैं व भारत के एक ‘घटक’ हैं । मैं आपको ‘अस्पृश्य’ नहीं मानता । हम सभी एक जैसे एक दूसरे के ‘भाई-बंधु’ हैं । निश्चित ही हमारे ‘अधिकार’ भी एक हैं । भाषण के अंत में उन्होने कहा, “ आपने मुझे ‘अपना’ माना है । अंतिम समय तक यह प्रेम ‘बनाये’ रखें । कितना भी ‘कष्ट’ हो, ‘त्रास’ हो उसकी ‘फिक्र’ न करें, मैं आपकी ‘उन्नति’ के ‘महान’ कार्य में ‘शामिल’ रहूँगा /”

भारत में EVMs का इस्तेमाल १९८२ से...???

*भारत में EVMs का इस्तेमाल १९८२ से...???*
भारत में EVMs १९८२ मे लाये गए। जिन्हें केरल के जिला अर्नाकुलम के परुर विधानसभा में पहली बार इस्तेमाल किया गया। उस विधानसभा में ८४ में ५० पोलिंग स्टेशन पर लोगों ने EVMs से वोट दिए।
वहाँ ए.सी.जोस ३०,३२७ वोट से जीत गए और सिवन पिल्लई केवल १२३ वोटों से हार गए। सिवन पिल्लई ने *रिप्रेसेन्टिन पीपल एक्ट (1951)* और *कंडक्ट ऑफ़ इलेक्शन रूल्स (1961)* हा हवाला देते हुए सुप्रिम कोर्ट में केस दायर किया। सुप्रिम कोर्ट ने भी इन दो कानूनों को ध्यान में रखते हुए कहा के चुनाव आयोग को कोई अधिकार नहीं के वे रिप्रेसेन्टिन पीपल एक्ट  के विरोध में चुनाव लेने का काम करें। RPA में साफ तौर पर लिखा है कि चुनाव केवल बैलेट पेपर पर ही होने चाहिए। चुनाव आयोग को सुप्रिम कोर्ट ने खरी सुनाने के बाद १९८९ में संसद में RPA कानून में बदलाव कर भारत में EVMs के इस्तेमाल को संवैधानिक करार दिया। मगर फिर भी ८ अक्टुबर २०१३ को सुप्रिम कोर्ट ने दिये फैसले के मुताबिक EVMs से मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव नहीं हो सकते, इसलिए EVMs के साथ VVPAT मशीन लगाने के निर्देश दिये गए थे। सुप्रिम कोर्ट ने ये फैसला दिए अब ३ साल और ४ महिने हो गये है, लेकिन VVPAT सभी EVMs को नहीं लगाई गई। यदि चुनाव आयोग के पास सभी EVMs को लगाने के लिए पर्याप्त VVPAT या पैसा नहीं है तो उन्हें चाहिए के जहाँ पर भी VVPAT नहीं लगाई वहाँ बैलेट पेपर से ही चुनाव करवा ले और EVMs में होनेवाली धांधली को रोका जा सके, ताकि लोगों का चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा बना रहे...
२०१४ लोकसभा इलेक्शन में संजस निरूपम काँग्रेस पार्टी के सांसद सदस्य थे, मुंबई मे उन्होने टीव्ही पर आकर कहाँ EVM मशीन मे गडबडी है| आसाम का जो काँग्रेस पार्टी का State Unit है वह सारे State Unit के लोगों ने ऑब्जेक्शन लिया, मगर काँग्रेस के सेंट्रल लीडरशिप ने इस बात को नजर अंदाज किया| दुसरा ओरिसा में गडबडी हुई, बंगाल में गडबडी हुई,बंगाल मे आधीरंजन चौधरी काँग्रेस पार्टी का प्रेसिडेंट  है| उसने लिखीत मैं इलेक्शन कमीशन को शिकायत दी मगर सेंट्रल लीडरशिप  जो कांग्रेस में है उसने किसी प्रकार का कोई स्टेटमेंट इशू नही किया| काँग्रेस की इतनी पिटाई हुई मगर काँग्रेस ने कभी यह नही कहाँ कि चुनाव मशीन में गडबडी होने की वजह से हमारी पिटाई हुई| काँग्रेस ने ऐसा बिल्कूल भी नही कहाँ, लेकिन काँग्रेस ने ऐसा क्यों नही कहाँ? ये सोचने वाली बात है..

सत्ता लाना होतो सारे हथकंडे अपनाने होंगे ?
उत्तरप्रदेश विधनसभा चुनाव २०१७ में ४०३ सीटों पर चुनाव आयोग के द्वरा किया गया !
मीडया में कभी बसपा की लहर, कभी बीजेपी की लहार, और कभी सपा की लहार बताया गया.
पर जैसी ही चुनाव आयोग ने ११ मार्च २०१७ का परिणाम घोषित किया,
शाम होते होते मायावतीं जी ने EVM में गड़बड़ है ऐसा विरोध किया,
साथ ही अखलेश यादव जी ने भी EVM पर विरोध जताया और राहुल गाँधी ने भी EVM के विरोध में बोले
पर इन नेताव ने खाली मुह से स्टेटमेंट दिया पर इन नेताव ने कोर्ट में जाने की जहमत नही उठाई.
ऐसा किसी भी नेता ने नही कहा EVM की जाँच हो और इस परिणाम को रद्द किया जाये
नाही किसी नेता ने कोर्ट में अपील की!

पर मैं कहता हु उत्तरप्रदेश में ४०३ सीटों पर चुनाव नही हुआ, बल्कि ३० पर चुनाव कराया गया है.
यह मैं यह दावे से कहता हु, ३७३ सीटों पर चुनाव हुआ ही नही अगर मैं गलत हु, तो चुनाव आयोग
मेरे पर कॅश दर्ज कर दे, साथ ही देश के नेता भी मुझ पर केश दर्ज कर सकते है.
२०१३ में सुप्रीमकोर्ट ने जजमेंट दिया चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी हो इसके लिए voter-verified paper audit trail (VVPAT) लगाया जाये ऐसा चुनाव आयोग को सुप्रीमकोर्ट ने आदेश दिया गया , पर चुनाव आयोग ने (VVPAT) ४०३ सीटों से
सिर्फ ३० जगह पर लगाया.
तो मैं ये कैसे मान लूँ ३७३ सीटों पर चुनाव पारदर्शी हुआ.
या ३७३ सीटों पर चुनाव हुआ ही नही है ये में दावे के साथ कहता हु !

उत्तर प्रदेश में बीजेपी मुख्यमंत्री मात्र २५ सीटों से बनाया गया है.
३७३ सीटों को चुनाव आयोग, मिडिया, और कोर्ट ने नजर कर दिया!
साथ ही उत्तर प्रदेश की जनता ने ३७३ सीटों पर वोटिंग ही नही किया है
ये भी मैं दावे से कह सकता हु.   (बीजेपी २५,सपा ४,बसपा १)

चुनाव आयोग ने २०१९ को होनेवाले आम चुनाव में सभी पोलींग बुथपर VVPAT लगाने कि घोषणा कर दी है। साथ में यह भी कहा है कि अगर कही पर मतों कि गिणती में कोई संदेह उत्पन्न होता है तो वे पेपर ट्रैल को भी गिनेंगे। इसके लिए उन्होंने केंद्र सरकार से ३,१७४ करोड रुपए कि मांग की है। अब सरकार कि ये जिम्मेदारी है कि वे चुनाव आयोग को मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करवाने के लिए पैसा मुहैया कराये। अगर केंद्र सरकार पैसा नहीं देती तो चुनाव आयोग को केंद्र सरकार की शिकायत सुप्रिम कोर्ट में करने कि पुरी छुट है, क्योंकि VVPAT लगाने का निर्णय सुप्रिम कोर्ट ने दिया है।

EVM में गड़बड़ी के आरोप पर EC का मायावती को जवाब, कहा- आरोप में कोई दम नहीं..
ऐसा कहा ECI ने!

मैं सबूत के साथ कह रहा हु ,
तो फिर ECI केंद्र सरकार से ३,१७४ करोड रुपए कि मांग क्यू की,
ECI अगर आप का जवाब है, मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करवाने का है,
तो उत्तर प्रदेश में ३७३ सीटों की पारदर्शी साबित करो की मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी
चुनाव तुमने उत्तर प्रदेश में करवाया है...

हितेश प्रजापति

Tuesday, February 28, 2017

आदर्श

हमारे "आदर्श" बदलते है तो, हमारे "विचार" बदलते है ।

"विचार" बदलते है तो, "सोचने का तरीका" बदल जाता है ।

"सोचने का तरीका" बदल जाता है तो, हमारी "मानसिकता" बदल जाती है ।

"मानसिकता" बदलती है तो, हमारे "तर्क" बदल जाते है ।

हमारे "तर्क" बदलते है तो, हम "सवाल जवाब" करते है ।

हम "सवाल जवाब" करते है तो, हमारे बिच "चर्चा" ए होती है ।

हमारे बिच "चर्चा" होती है तो, हमे "सही और गलत" का "ज्ञान" होता है ।

"सही और गलत" का "ज्ञान" हो जाए तो, हम आपने "हकधिकार" पाने
के लिए "विद्रोह" करते है ।

हम आपने "हकधिकार" मिलने के लिए "विद्रोह" करते है तो, हम मे "त्याग", "समर्पण", "बलिदान" करने का "जज्बा" निर्माण हो जाता है ।

"त्याग", "समर्पण", "बलिदान" करने का "जज्बा" निर्माण हो जाता है तो, हमे कोई "पराजित" नही कर सकता ।

- मा. वामन मेश्राम साहब.
(राष्ट्रिय अध्यक्ष - बामसेफ / भारत मुक्ती मोर्चा)
जय मूलनिवासी

Sunday, February 26, 2017

सामाजिक परिवर्तन का कार्य आसान नहीं है!

सामाजिक परिवर्तन का कार्य आसान नहीं है! यह एक दुःखदायी प्रक्रिया  (Painfull Process )है! जिस प्रकार यदि किसी स्त्री को संतान चाहिए तो उसे प्रसुति की वेदना सहनी पड़ेगी! इन वेदनाओ को सहे बगैर वह माँ नहीं बन सकती है! उसी प्रकार हमें सामाजिक परिवर्तन चाहिए तो हमें परिवर्तन की प्रक्रिया के कष्ट झेलने ही होंगे! इन कष्टो और मुसीबतो को सहे बगैर हम परिवर्तन नहीं ला सकते! आज के वातावरण मैं हमारे देश मे सामाजिक परिवर्तन की बात  करना आसान नहीं है! यह हिम्मत  (Guts) और साहस (Courage ) का कार्य है! जो लोग हिम्मत और साहस दिखा सकेंगे, वे ही  यह कार्य कर सकेंगे! !!!!

मा डी के खापडेॅ (संस्थापक सदस्य बामसेफ )
जागो बहुजन  !!!!जय मुलनिवासी! !!!

पढा-लिखा होना जागृत होना दोनों में अंतर है।

पढा-लिखा होना जागृत होना दोनों में अंतर है।
किताबों को पढ लेने से, या डिग्रियां हासिल कर लेने से कोई जागृत नहीं कहा जा सकता, हर शिक्षित व्यक्ति जागृत ही हो, ऐसा नहीं है।
जागृति का प्रथम सिध्दांत है,
अपने दोस्त की पहचान होना।
जागृति का दूसरा सिध्दांत है,
अपने दुश्मन की पहचान होना।
जागृति का तीसरा सिध्दांत है,
अपने ताकत और कमजोरी मालूम होना।
जागृति का चौथा सिध्दांत है,
दुश्मन की ताकत और कमजोरी मालूम होना। और
जागृति का पांचवां सिध्दांत है,
अपने महापुरुषों का इतिहास मालूम होना।
यह पांच बातें अगर आपको मालूम है, और आप अनपढ़ भी हो फिर आप जागृत कहे जा सकते हो। और अगर आपको ये पांच बातें नहीं मालूम है, और आप शिक्षित भी हो फिर भी आप जागृत नहीं हो।
आप डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, IPS, IAS, हो सकते हो मगर आप जागृत नहीं कहे जा सकते।
शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागृति बहुत जरूरी है, समाज उत्धान के लिए। हमारे पढें लिखें अधिकारी कर्मचारी, PHD Holder उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को हमारा सही इतिहास नहीं पता। पता नहीं होना यह बुरी बात नहीं है परन्तु जब पता चल जाये कि मैंने सब कुछ पढा जो लोगों ने मुझे पढाया परन्तु मुझे मेरे महापुरुषों का इतिहास नहीं पता। हमारे महापुरुषों के जीवन संघर्ष और बलिदान। जिसकी वजह से हमें शिक्षा लेने का अधिकार शिक्षा देने का अधिकार सम्पत्ति रखने का अधिकार वस्त्र धारण का अधिकार मिला अगर यह जानकारी पता चल जाये उसके बाद भी हमारा आदमी सिर्फ खाने पिनें बीबी बच्चों को पालने घर गृहस्थी जमाने सम्पत्ति इक्ढा करना ही जीवन का उद्देश्य रखता है। तो तुम्हारा तुम्हारे बच्चों का तुम्हारे जीवन का भविष्य सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे समाज का दुश्मन ही तय करेगा हो सकता है कि तुम बच जाओं परन्तु तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों कि गुलामी के जिम्मेदार तुम खुद होगें।